भारतीय मजदूर संघ के सिद्धान्तों को मिली वैश्विक मान्यता: अनुपम

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लखनऊ। भारतीय मजदूर संघ की स्थापना 23 जुलाई 1955 को भोपाल में की गयी थी। स्थापना के समय तय हुआ था कि भारतीय मजदूर संघ गैर राजनीतिक संगठन होगा। राष्ट्र हित और उद्योग हित को ही सर्वोपरि माना जायेगा।
भारतीय मजदूर संघ ने अपनी स्थापना के समय तय सिद्धान्तों को आधार मानकर अपना संगठन खड़ा किया और किसी भी राजनैतिक दल से सम्बद्धता न रखते हुए स्वतंत्रत तथा स्वायत्त संगठन खड़ा किया। बाद में बीएमएस के सिद्धान्त को विश्वभर में मान्यता मिली।

भारतीय मजदूर संघ के उत्तर मध्य क्षेत्र (उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली) के क्षेत्र संगठन मंत्री अनुपम ने बताया कि भारतीय मजदूर संघ ने जब गैर राजनीतिक संगठन की बात कही तो अन्य श्रम संगठनों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ।

उन्होंने बताया कि 13 से 20 नवंबर 1990 में रूस की राजधानी मास्को में बारहवीं वर्ल्ड फेडरेशन आफ ट्रेड यूनियन का विश्व स्तरीय सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में 133 देशों की चार हजार यूनियनों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों से 1350 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था, जिसमें मजदूर संघ से भी दो प्रतिनिधि गये थे। उस सम्मेलन में भारतीय मजदूर संघ के प्रतिनिधियों ने गैर राजनीतिक श्रम संगठन के समर्थन में एक प्रस्ताव रखा, जिसे सर्व सम्मति से पारित किया गया। इसी सम्मेलन में लाल झण्डा उतारकर सफेद ध्वज फहराया गया। इससे 38 दिन पूर्व रूस के सभी श्रम संगठन एकत्रित हुए थे तथा उनके द्वारा राजनीतिक मोर्चे को निरस्त कर एक नया महासंघ बनाया गया था जो कि गैर राजनीतिक था।

विश्व व्यापार और अंतरराष्ट्रीय श्रममानक

जून 1994 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के वार्षिक सम्मेलन के समय विश्व व्यापार और अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के सिद्धान्त के बारे में भारतीय मजदूर संघ ने जो विचार प्रकट किया था, उसका विश्व के प्रगतिशील राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने स्वागत किया। दुनिया भर के देशों से मजदूर प्रतिनिधियों ने भारतीय मजदूर संघ को सभी प्रकार से सहयोग करने की बात कही।

अनुपम ने बताया कि विदेशों में जब-जब भारतीय मजदूर संघ को अवसर मिलता है तब-तब वह श्रम समस्या के प्रति भारतीय दृष्टिकोण को दुनिया के सामने रखता है। उन्होंने बताया कि, वामपंथी मजदूर संगठनों ने जब नारा दिया कि दुनिया के ‘मजदूरों एक हो’, तब इस पृथकतावादी चिंतन को चुनौती देते हुए मजदूर संघ ने नारा दिया कि ‘मजदूरों दुनिया को एक करो’। यह भाव श्रमिकों को स्मरण कराता है कि उनका अंतिम लक्ष्य समूची मानव जाति का उत्थान है न कि मात्र श्रमिकों के कल्याण तक सीमित है।

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