RANCHI। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय की कुलसचिव डा. नमिता सिंह ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता संस्कृत वाङ्मय का एक अत्यन्त लोकप्रिय दार्शनिक ग्रन्थ है, जिसमें दर्शन, धर्म और नीति का समन्वय हुआ है। इसके सन्देश का क्षेत्र सार्वभौम है एवं मानवमात्र के लिए कल्याणकारी हैं।
डा. सिंह ने डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, राँची, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, चुनार, मीरजापुर एवं चातुर्वेद संस्कृत प्रचार संस्थान, काशी के संयुक्त तत्त्वावधान में ऑनलाइन समायोजित एकादशी श्रीमद्भगवद्गीता राष्ट्रीय व्याख्यानगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए ये बाते कहीं।
उन्होंने आगे कहा कि मानव-जीवन की समस्त समस्याओं का निदान गीता में मिलता है। गीता हमें उच्च आकांक्षा एवं आशा के अनुरूप जीने के लिए अन्तःप्रेरणा देती है।
गीता को उद्धृत करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि दैवी-सम्पत्ति मुक्ति के लिये और आसुरी-सम्पत्ति बन्धनके लिये है। अतः हमें दैवी गुणों का अनुसरण करना चाहिए।
मनुष्य को काम, क्रोध और लोभ का त्याग कर देना चाहिए क्योंकि ये आत्मनाश के द्वार हैं। मानवमात्र को समत्वभाव से कार्य करते हुए कर्तव्यपथ पर आगे बढ़ना चाहिए।
शारदापीठ महाविद्यालय, द्वारका,गुजरात के सेवानिवृत्त संस्कृतविभागाध्यक्ष एवं संगोष्ठी के मुख्य वक्ता आचार्य सच्चिदानन्द द्विवेदी ने कहा कि श्रीमद्बगवद्गीता धर्मानुकूल आचरण पर बल देती है। धर्माचरण करते हुए ही हमें जीवनसंग्राम का सामना करना चाहिए। भारतभूमि और भारतीयता की रक्षा करने के लिए हमें गीता के सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए।
संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, राँची के संस्कृत विभागाध्यक्ष डा. शैलेश कुमार मिश्र ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय परंपरा में विद्यमान शास्त्रों की विशाल ज्ञानराशि का निचोड़ है। भगवद्गीता इन्द्रियों के वशीभूत होकर अनैतिक आचरण में डूबे लोगों का मार्गनिर्देशन कर सकती है। जीवन में दुःख से मुक्ति के लिए मनोनिग्रह आवश्यक है। उन्होंने मनोनिग्रह के लिए गीता में बतलाए गए दो उपायों अभ्यास और वैराग्य की चर्चा की। उन्होंने कहा कि चंचल मन के नियंत्रण से ही से ईर्ष्या-द्वेष, लूट-खसोट, दुष्कर्म, हत्या से दुखी समाज खुशहाल हो सकता है।
अतिथियों का स्वागत करते हुए डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष एवं संगोष्ठी के समन्वयक डा. धनंजय वासुदेव द्विवेदी ने कहा कि गीता ज्ञानविज्ञान के अनुपमविश्वकोष महाभारत का सर्वोत्कृष्ट अंश है। परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से निःसृत यह गीता परमनिःश्रेयससाधिका है। गीता की लोकोत्तररमणीयता, अनन्तविश्वसनीयता, सार्वभौम उपयोगिता, आध्यात्मिकता इसे महान् बना देती है। गीता उपनिषदों के गूढ़ अध्यात्मज्ञान का परमाह्लादमय नवनीत है।
भीलवाड़ा, राजस्थान के मोहित शर्मा ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। ज्योत्स्ना शुक्ला एवं शमीक शुक्ला ने गीता-श्लोक पाठ प्रस्तुत किया। संगोष्ठी का संचालन राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मऊ के सहायकाचार्य डा. चन्द्रकान्तदत्तशुक्ल ने किया। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मीरजापुर के सहायकाचार्य डा. प्रभात कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
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