Khunti: वैसे तो आपको सुनने में अजीब लगेगा लेकिन सच है। तोरपा प्रखंड के सोनरपुर गढ़ में माता दुर्गा की ऐसी मूर्ति की आराधना की जाती है, जिनकी नाक कटी हुई है। इसलिए इनका नाम ही नकटी देवी है और क्षेत्र का नाम है नकटी देवी मंदिर। नकटी देवी में न सिर्फ आसपास के गांवों, बल्कि दूर दराज के लोगों की भी अटूट आस्था है।
मान्यता है कि नकटी देवी मंदिर में जो भक्त सच्चे मन से मनौती मांगते हैं, उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। सोनपुर गढ़ की नकटी देवी माता का मंदिर तोरपा प्रखंड मुख्यालय से लगभग 12 किमी है। माता रानी की नाक कटी मूर्ति पीपल पेड़ की जड़ पर है। वैसे तो हर दिन श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए मंदिर पहुंचते हैं लेकिन मंगलवार को यहां काफी भीड़ होती है।
क्या है इतिहास
वैसे तो माता नकटी देवी के बारे में किसी के पास सटीक जानकारी नहीं है लेकिन मंदिर की देखरेख करने वाले परिवार के सदस्यों और वहां के पुजारी सुधीर मिश्रा के मुताबिक नकटी देवी के बारे में वे अपने पूर्वजों से सुनते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि किंवदंती के अनुसार प्राचीन काल में सोनपुर गढ़ नागवंशी राजाओं की राजधानी थी। माता दुर्गा राजपरिवार की कुलदेवी थी। राजा और रानी भक्तिभाव से हर दिन माता की पूजा करते थे। एक दिन माता के मंदिर के दरवाजे पर राजा के पुत्र की हत्या हो गई। इससे राजा को गहरा आघात लगा और वे अपनी कुलदेवी को छोड़कर सोनपुर गढ़ से दूसरी जगह चले गये।
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इस पर माता रानी ने राजा को श्राप दिया कि कोई भी नागवंशी राजा या उस परिवार के सदस्य सोनपुर गढ़ नहीं जा सकते। आज भी नागवंशी राज परिवार के सदस्य नकटी देवी मंदिर नहीं जाते और न ही उस गांव का पानी पीते हैं। माता दुर्गा का नाम नकटी देवी पड़ने के संबंध में पुजारी कहते हैं कि इसकी जानकारी किसी को ेनहीं है लेकिन वे दादा-परदादा से सुनते आये थे कि भगवान शिव ने ही किसी कारण से माता रानी की नाक काट दी थी। इसके बाद से ही इनकी पूजा-अर्चना नकटी देवी के नाम से होती आ रही है। नवरात्र के दौरान यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
पीपल पेड़ पर भगवान गणेश, पंचदेवता और शेष नाग की आकृति
जिस पेड़ की जड़ पर माता नकटी देवी विराजमान हैं, उस पेड़ पर कुछ ऐसी आकृतियां उभर आयी हैं, जो देखने में भगवान गणेश और पंचदेवता की लगती हैं। पुजारी ने कहा कि उसी के सामने हाल के दिनों में जमीन से माता सरस्वती की एक छोटी सी प्रतिमा भी निकली है।