रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य के सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाने पर कड़ी टिप्पणी की है। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस अधिकारियों की रुचि यह सुनिश्चित करने में है कि पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे न लगाए जाएं। 18 जून 2026 के आदेश और इससे पहले उच्च न्यायालय की खंडपीठों की ओर से दिए गए कई निर्देशों के बावजूद थानों में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाए गए हैं।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से पहले भी टेंडर निकालने और फिर उसे रद्द करने जैसे कारण बताए जाते रहे हैं। प्रथम दृष्टया ये बहाने संतोषजनक नहीं हैं। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य के सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के आदेश का अब तक पालन नहीं होने पर कड़ी नाराजगी जताई है।
कोर्ट ने वर्तमान डीजीपी तदाशा मिश्रा को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जाए। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर 2026 को होगी। खंडपीठ ने कहा कि 18 जून को डीजीपी के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी करने पर विचार किया गया था, लेकिन एक और अवसर देते हुए उन्हें अनुपालन का मौका दिया गया।
मुख्य सचिव और गृह सचिव को भी आदेश की गंभीरता से डीजीपी को अवगत कराने और आदेश का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया था। इसके बावजूद कोर्ट ने पाया कि आज तक किसी भी पुलिस थाने में सीसीटीवी कैमरे लगाने की दिशा में प्रभावी अनुपालन नहीं हुआ है।
उच्च न्यायालय ने डीजीपी तदाशा मिश्रा को नोटिस जारी कर पूछा है कि पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाने के आदेशों का पालन नहीं करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। डीजीपी चाहें तो 11 सितंबर 2026 तक अपना शपथपत्र दाखिल कर सकती हैं। कोर्ट ने इस बार मुख्य सचिव और गृह सचिव को संयुक्त एवं व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए निर्देश दिया कि राज्य के सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का काम आठ सप्ताह के भीतर पूरा कराया जाए।
मुख्य सचिव या गृह सचिव को किसी अन्य अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपे बिना स्वयं इस मामले में अनुपालन सुनिश्चित करना होगा। उन्हें 30 सितंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने कहा कि आठ सप्ताह का समय दिया जा रहा है, लेकिन यह भी देखा जाएगा कि सरकार वास्तव में अनुपालन की दिशा में गंभीर कदम उठा रही है या फिर सुनवाई से दो-तीन दिन पहले वही पुराने बहाने लेकर शपथपत्र दाखिल करती है।
खंडपीठ ने कहा कि इसी मामले में एक व्यक्ति को पुलिस हिरासत में बेरहमी से पीटे जाने की शिकायत के बाद उच्च न्यायालय को स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका शुरू करनी पड़ी थी। व्यक्ति के शरीर पर स्पष्ट चोटों के बावजूद डॉक्टर ने उसे हिरासत के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट बताया था। कोर्ट ने बताया है कि डॉक्टर की रिपोर्ट ने उसकी अंतरात्मा को झकझोर दिया था, जिसके बाद डॉक्टर के खिलाफ जांच का निर्देश दिया गया। काफी समय तक जांच टाली गई और अंततः 08 जुलाई 2026 की रिपोर्ट में डॉक्टर को क्लीन चिट दे दी गई। डॉक्टर को इस आधार पर दोषमुक्त किया गया कि शिकायतकर्ता के बाएं पैर में हुआ फ्रैक्चर क्लिनिकल जांच के दौरान पता लगाना संभव नहीं था। कोर्ट ने शिकायतकर्ता की तस्वीरों का उल्लेख करते हुए कहा कि तस्वीरों में शरीर और बाएं पैर पर गंभीर चोटें स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। ऐसे में पेशेवर रूप से प्रशिक्षित डॉक्टर चोटों को देखकर सही रिपोर्ट देने में असमर्थ थीं, यह बात कोर्ट को स्वीकार्य नहीं है।
खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया इन टिप्पणियों के आधार पर डॉ जया अग्रवाल को व्यक्तिगत हैसियत से मामले में प्रतिवादी बनाने का निर्देश दिया है। उन्हें चांडिल स्थित अनुमंडलीय अस्पताल के माध्यम से और स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव के जरिए नोटिस भेजा जाएगा। कोर्ट ने डॉ जया अग्रवाल से पूछा है कि 08 जुलाई 2026 की वह रिपोर्ट, जिसमें उन्हें दोषमुक्त किया गया है, स्वीकार क्यों की जाए। उन्हें नोटिस की सेवा के दो सप्ताह के भीतर अपना शपथपत्र दाखिल करने की छूट दी गई है।



