रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने 19 वर्ष पुराने एक नक्सलवाद से जुड़े मामले में प्रमिला देवी की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।
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उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी की एकलपीठ ने गुमला की निचली अदालत द्वारा 7 अप्रैल 2007 में सुनाई गई दोषसिद्धि और 9 अप्रैल 2007 को सुनाई गई सजा को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने कई पहलुओं पर उचित विचार किए बिना दोषसिद्धि दर्ज की थी, इसलिए दोषसिद्धि और सजा का आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
उल्लेखनीय है कि गुमला की निचली अदालत ने प्रमिला देवी को हत्या के प्रयास, सरकारी कार्य में बाधा डालने, लूट के सामान रखने, आर्म्स एक्ट और आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम की विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराते हुए आठ साल कारावास सहित अन्य सजाएं सुनाई थीं।
उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रमिला देवी लगभग सात वर्ष आठ महीने जेल में रह चुकी थीं और वर्ष 2011 में सजा पूरी करने व जुर्माना जमा करने के बाद रिहा हो गई थीं। इसके बावजूद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह मामला उनके पूर्ण बरी किए जाने का बनता है।
दरअसल, यह मामला वर्ष 2004 को गुमला जिले के बिशुनपुर थाना क्षेत्र के निनार गांव का है। इस गांव में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी। पुलिस ने दावा किया था कि मुठभेड़ के दौरान दो नक्सली मारे गए, जबकि प्रमिला देवी और एक अन्य महिला को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के अनुसार, प्रमिला देवी प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन के सब-जोनल कमांडर प्रतुल भुइयां उर्फ रंधीरजी की पत्नी थीं।
उच्च न्यायालय ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि प्रमिला देवी के कब्जे से कोई हथियार या आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई थी। अदालत ने यह भी कहा कि उनके खिलाफ किसी प्रत्यक्ष या विशिष्ट आपराधिक कृत्य का कोई विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि केवल घटनास्थल पर मौजूद होना, वह भी डेढ़ वर्ष की बच्ची को गोद में लेकर और किसी नक्सली की पत्नी होना किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता है। अभियोजन यह भी सिद्ध नहीं कर सका कि प्रमिला देवी किसी नक्सली संगठन की सक्रिय सदस्य थीं।




