खूंटी। पांचवी अनुसूची क्षेत्र के खूंटी जिला में आदिवासी समाज ने “पारंपरिक उलगुलान” तथा “सामाजिक डीलिस्टिंग” के तहत धार्मिक -सांस्कृतिक पुनर्जागरण और पारंपरिक स्वशासन की रक्षा के लिए एक बुधवार को एक आंदोलन की शुरुआत की गई है।
बिरसा मुंडा भगवान ने अंग्रेजों के खिलाफ उलगुलान किया था। यह उलगुलान ज़मीन, धर्म और परंपरा को बचाने के लिए शुरू किया गया था। आज बिरसा भगवान के जन्मस्थल से ही, उनके अनुयायी द्वारा परंपरा और धर्म के संरक्षण के लिए सामाजिक आंदोलन शुरू किया गया है। यह उलगुलान तीर धनुष नहीं , बल्कि क़ानून के मदद से किया जाएगा ।
मुख्य बिंदु:
-ग्राम सभा पारंपरिक, सामाजिक एवं धार्मिक संस्था है—इसे केवल प्रशासनिक इकाई न माना जाए
-PESA Act और संविधान (अनुच्छेद 25, 26, 29) के तहत रूढ़िजन्य विधि , धार्मिक एवं सामाजिक प्रथा के संरक्षण का वचन है
-धर्मांतरित आदिवासी पारंपरिक आदिवासी संरचना में पदाधिकारी नहीं बन सकते हैं , क्योंकि इन पदों में धार्मिक एवं सामाजिक ज़िम्मेदियाँ जुड़ी रहती है । अतः धर्मांतरित आदिवासी सामाजिक ज़िम्मेदारी तो निभा लेगा , लेकिन धार्मिक ज़िम्मेदारी नहीं निभा पाएगा। लेकिन आज राज्य के कई ग्राम सभा / बहुस्त्रीय पारंपरिक व्यवस्था में ईसाई ग्राम प्रधान , पाहन, पड़हा राजा , इत्यादि , पदस्थापित हैं। इससे समाज के पारंपरिक विरासत को बहुत क्षति पहुंच रही है। अतः इस “पारंपरिक उलगुलान” को “सामाजिक डीलिस्टिंग” भी कहा जा सकता है
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-गैर-पारंपरिक जिउड़ी ग्राम सभा अर्थात् “मॉडल ग्राम सभा” तथा “संयुक्त पड़हा” जैसी संरचनाओं को समाज द्वारा ख़ारिज किया गया । इन संरचनाओं को धर्मांतरित आदिवासी द्वारा बनाया गया है । यह एक प्रकार का सांस्कृतिक घुसपैठ है । यह कल्चरल हेजेमनी है। यह आदिवासी समाज के मूल पहचान पर कब्जा करने की षड्यंत्र है
-उदाहरण – आज पाहन ( पुजारी ) के पद पर भी धर्मांतरित आदिवासी कब्जा किए हुए हैं । जबकि इस पद की केवल धार्मिक जिम्मेदारी होती है । इसी पद से जुड़े भुईहरी/पहनाई जैसी धार्मिक भूमि ( भुईंहारी, खूँटकट्टी ज़मीन ) पर इनके द्वारा कब्ज़ा बना कर रखा गया है ।इस ज़मीन को प्रशासन द्वारा को ग्राम सभा के नियंत्रण में वापस लाने में सहयोग की माँग की गई
-इसी प्रकार ग्राम सभा / आदिवासी बहुस्तरीय व्यवस्था के सभी पदों की धार्मिक और सामाजिक दोनों जिम्मेदारी होती है । उदाहरण – ग्राम प्रधान पर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के अलावा , सभी त्योहार , पूजा , धार्मिक संस्कार , इत्यादि , का आयोजन करने की जिम्मेदारी भी होती है
-यह आंदोलन किसी ख़ास समुदाय के विरोध में नहीं, बल्कि अपनी आदिवासी परंपरा, आस्था और अस्तित्व की रक्षा के लिए है ।
-जिला उपायुक्त द्वारा ग्राम सभा को मान्यता देने के लिए एक टीम गठित किया जाना है । समाज द्वारा आग्रह किया गया की इस टीम में पारंपरिक समाज के अगुआ को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए
-केवल पारंपरिक ग्राम सभा को ही मान्यता दी जाए ,जिसमें पारंपरिक पदाधिकारी यथा मुंडा , पाहन , पाइनभरा, महतो , इत्यादि , रूढ़ियों द्वारा पदस्थापित हों
-इस आंदोलन को राज्य के सभी जिलों में जारी रखा जाएगा।


